उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी सीईओ के ऑफिस को 27 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया पोस्ट की भाषा के लिए माफी मांगनी पड़ी। विवाद की शुरुआत मतदाता सूची में नाम की गड़बड़ी से हुई थी, जिसके जवाब में कार्यालय ने ऐसा व्यंग्य किया, जिसमें जाति और धार्मिक अल्पसंख्यकों का उल्लेख था
बाद में सीईओ ऑफिस ने स्वीकार किया कि उसकी पोस्ट की भाषा, लहजा और तीखी टिप्पणियां किसी आधिकारिक हैंडल से अपेक्षित संवाद के अनुरूप नहीं थीं। आयोग ने उन लोगों से माफी मांगी जो पोस्ट से आहत हुए थे और आगे से संवाद को मर्यादित और औपचारिक रखने का आश्वासन दिया।
दरअसल, भारत में चुनाव आयोग से उम्मीद की जाती है कि वह राजनीतिक दलों के बीच निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा। ऐसे में यह माफी एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है कि आखिर चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था के आधिकारिक संवाद में ऐसी भाषा आई कैसे? क्या यह महज एक सोशल मीडिया पोस्ट की चूक थी या राजनीतिक आलोचना का जवाब देने के तरीके में कोई व्यापक बदलाव आया है?
विवाद उत्तर प्रदेश विधान परिषद की स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज एक नाम से शुरू हुआ। सूची में ‘रामहित’ नाम का हिंदी रूपांतरण इस तरह हो गया कि उसका अर्थ ‘राम ने यादव को मारा’ निकलने लगा। मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी सीईओ के कार्यालय ने बाद में इसे सॉफ्टवेयर से जुड़ी गलती बताया। उनका कहना था कि अंग्रेजी में Ramhit Yadav को Ram hit Yadav लिख दिया गया और सॉफ्टवेयर ने उसका शब्दश: हिन्दी अनुवाद कर दिया।
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इस गलती पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि गलती में यादव का नाम ही क्यों आया और क्या कंप्यूटर जाति के आधार पर भेदभाव कर रहा था। उनका सवाल राजनीतिक आरोपों के साथ साथ मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर भी था।
इसके जवाब में उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के आधिकारिक हैंडल से व्यंग्यात्मक टिप्पणी की गई। पोस्ट में कहा गया कि ‘सॉफ्टवेयर जातिवादी नहीं होता और गलती के बावजूद जातिगत भेदभाव नहीं हुआ। भगवान का शुक्र है कि राम ने किसी अल्पसंख्यक को नहीं मारा, वरना जातिवाद के साथ सांप्रदायिकता के आरोप भी लगते।
यही वह बिंदु था जहां तकनीकी गलती पर स्पष्टीकरण देने के बजाय आधिकारिक संवाद ने राजनीतिक और धार्मिक कटाक्ष का रूप ले लिया। इस भाषा की विपक्षी नेताओं और सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हुई और अगले ही दिन सीईओ कार्यालय ने अपनी भाषा के लिए माफी मांग ली।
चुनाव आयोग के अधिकारी सरकारी कर्मचारी होते हैं न कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे कानून, प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जवाब दें। उनकी जिम्मेदारी किसी राजनीतिक दल या नेता को जवाबी कटाक्ष से परास्त करना नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में भरोसा बनाए रखना है।
हालांकि सोशल मीडिया पोस्ट किसी अधिकारी के निजी खाते से नहीं, बल्कि एक आधिकारिक संस्थागत हैंडल से की गई थी लेकिन ऐसे हैंडल से जारी संदेश को लोग संबंधित कार्यालय का आधिकारिक पक्ष मानते हैं। इसलिए उसकी भाषा की जवाबदेही भी उसी संस्था पर आती है।
वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं, “उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं। उन्हें राजनीतिक विरोधियों की तरह जवाब देने के बजाय निष्पक्षता और संयम का उदाहरण पेश करना चाहिए।”
दरअसल, इस घटना में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि किसी अधिकारी ने तीखा जवाब क्यों दिया बल्कि सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के आधिकारिक संवाद में ऐसी भाषा को सामान्य माना जाने लगा है और क्या आलोचना के जवाब में तथ्य और प्रक्रिया से हटकर व्यंग्य करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है?
सीईओ ऑफिस की माफी बताती है कि इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर आपत्ति गंभीर थी, लेकिन माफी के बाद भी संस्थागत जवाबदेही का सवाल बना हुआ है कि ऐसी पोस्ट किसने तैयार की, किस स्तर पर उसे मंजूरी मिली और क्या भविष्य में ऐसी चूक रोकने के लिए कोई आंतरिक प्रक्रिया बनाई जाएगी?
यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की यह घटना ऐसे समय सामने आई है जब देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विपक्षी नेताओं के साथ व्यवहार को लेकर भी विवाद जारी हैं।
अगस्त 2025 में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के आरोपों पर जवाब देते हुए ज्ञानेश कुमार ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से या तो अपने आरोपों के समर्थन में हलफनामा देने या देश से माफी मांगने को कहा था। विपक्ष के दूसरे नेताओं के साथ भी उनके संवाद या सोशल मीडिया पोस्ट पर दिए जवाब का तरीका भी ऐसा रहा है है मानो वो बतौर मुख्य निर्वाचन आयुक्त नहीं बल्कि एक राजनीतिक पार्टी के नेता की तरह संवाद कर रहे हों।
अप्रैल 2026 में तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त के साथ बैठक के दौरान उनके व्यवहार पर सवाल उठाए। पार्टी के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने दावा किया था कि ज्ञानेश कुमार ने नेताओं से अपमानजनक ढंग से बात की और दूसरे निर्वाचन आयुक्तों को बोलने का मौका तक नहीं दिया।
मेरठ के एक कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर सतीश प्रकाश कहते हैं, “चुनाव आयोग को अपने निर्णयों का बचाव करने और गलत दावों का खंडन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन तथ्यात्मक जवाब, कानूनी स्पष्टीकरण और राजनीतिक कटाक्ष के बीच स्पष्ट अंतर है। किसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता केवल उसके फैसलों से नहीं, बल्कि उन फैसलों और आलोचनाओं पर उसके संवाद के तरीके से भी बनती है। मौजूदा समय में चुनाव आयोग पर सत्तापक्ष का साथ देने के आरोपों के अलावा विपक्ष के साथ उसके व्यवहार को लेकर भी इसीलिए सवाल उठ रहे हैं।
दरअसल, देश के तमाम राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के सीईओ नवदीप रिनवा के कार्यालय के मुताबिक, पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र में एक कंप्यूटर सहायक ने 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच मतदाता विवरण में सुधार के लिए 13,779 फॉर्म-8 आवेदन दर्ज किए थे। इन 13,779 आवेदनों में से 10,470 को मंजूरी दी गई थी। लेकिन जांच के बाद मंजूर की गई सभी 10,470 प्रविष्टियों में अनियमितताएं पाई गईं।
यह मामला तब सामने आया जब कुछ मतदाताओं ने शिकायत की कि मतदाता पहचान पत्र यानी EPIC नंबर खोजने पर उनके नाम के बजाय दूसरे लोगों की जानकारी दिखाई दे रही थी। कांग्रेस पार्टी ने इस बारे में प्रेस कान्फ्रेंस भी की थी।
जांच के बाद दो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों के खिलाफ कानूनी और विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए गए। संबंधित कंप्यूटर सहायक की सेवाएं समाप्त करने का भी फैसला किया गया।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद आजमगढ़ में भी मतदाता सूची में एक ही हिंदी नाम से कई प्रविष्टियां दर्ज होने का मामला सामने आया। इस मामले में एक अहम तथ्य यह भी है कि गड़बड़ियां एक या दो प्रविष्टियों तक सीमित नहीं थीं बल्कि हजारों प्रविष्टियों के मंजूर होने के बावजूद उनके समर्थन में दस्तावेज न मिलना सत्यापन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर रहा है।
इन घटनाओं में एक समान बात यह है कि अनियमितताएं सामने आने के बाद अधिकारियों ने कार्रवाई की और जांच का दायरा बढ़ाया। शिकायतें समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी की ओर से दी गई थीं।
हालांकि अनियमितता की शिकायतें पहले भी मिलती रही हैं लेकिन कार्रवाई तो दूर, निर्वाचन आयोग शिकायतों का संज्ञान तक नहीं लेता था और उन्हें मिसलीडिंग या फर्जी कहकर नजरअंदाज कर देता था। लेकिन पीलीभीत और आजमगढ़ के मामलों के बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने पूरे राज्य में मतदाता सूची संबंधी काम की व्यापक समीक्षा के निर्देश दिए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार कहते हैं, “यह देश भर में चल रहे युवाओं और राजनीतिक दलों के विरोध प्रदर्शनों का असर है। चुनाव आयोग को ही देख लीजिए। पहले तो वह विपक्ष की बात ही नहीं सुनता था, अब सुन भी रहा है, गलतियां मान भी रहा है और सुधार भी रहा है। वही उत्तर प्रदेश भी हो रहा है और अन्य राज्यों में भी। दूसरे तमाम रिपोर्ट्स चुनाव आयोग की खामियों को ही नहीं, आयोग के भीतर चल रहे मतभेद को भी उजागर कर रही हैं जिसकी वजह से आयोग बैकफुट पर है।”
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Wednesday, October 28
