publicuwatch24.-रायपुर। खैरागढ़। जिला मुख्यालय खैरागढ़ के टिकरापारा स्थित मोती नाला पुलिया कई दिनों से बदहाल व्यवस्था और सरकारी आश्वासनों की कहानी बयां कर रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि करीब 75 से 80 साल पुरानी इस पुलिया के निर्माण की मांग पिछले 25 वर्षों से की जा रही है, लेकिन आज तक नया पुल धरातल पर नहीं उतर सका है। लोगों को हर बार तारीख, स्वीकृति और निर्माण शुरू होने का आश्वासन मिलता रहा, लेकिन पुल का काम अब भी शुरू नहीं हुआ है।
कई इलाकों को जोड़ता है यह मार्ग
बताया जा रहा है कि खैरागढ़ के कलेक्टर कार्यालय से नया टिकरापारा, अकरजन, सुतिया, देवरी और सिंगारघाट सहित आसपास के इलाकों को जोड़ने वाला यह महत्वपूर्ण मार्ग है। रोजाना बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग, ग्रामीण और वाहन चालक इसी पुलिया से गुजरते हैं। बारिश के दिनों में मोती नाला उफान पर आने के बाद हालात और गंभीर हो जाते हैं तथा स्थानीय लोगों के मुताबिक नया टिकरापारा क्षेत्र कई बार टापू जैसी स्थिति में पहुंच जाता है।
पुल निर्माण का इंतजार
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुल निर्माण की स्वीकृति की बात सामने आ चुकी है तो काम शुरू क्यों नहीं हुआ? स्थानीय लोगों के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल में भी इस पुल की घोषणा हुई थी। बाद में भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी इसके निर्माण के लिए स्वीकृति और बजट की बात सामने आई। दिसंबर में सांसद के प्रयास से स्वीकृति मिलने की बात कही गई, लेकिन महीनों बीतने के बाद भी न भूमि पूजन हुआ और न निर्माण शुरू हुआ।
लगातार हो रही दुर्घटनाएं
स्थानीय निवासी राजू यादव का आरोप है कि पिछले कई वर्षों में इस पुलिया के कारण लगातार दुर्घटनाएं हुई हैं। उनका दावा है कि पिछले करीब 10 वर्षों में 17-18 मवेशियों के बह जाने की जानकारी है, जबकि कई लोगों के हाथ-पैर टूट चुके हैं। उन्होंने करीब 25 से 30 लोगों के घायल होने और कुछ लोगों के स्थायी रूप से दिव्यांग होने का दावा किया। हालांकि, इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि प्रशासन से होना बाकी है। वहीं बारिश के दौरान पुलिया और आसपास का इलाका स्थानीय लोगों के लिए और ज्यादा जोखिम भरा हो जाता है। स्कूली बच्चों के आवागमन के साथ ही मवेशियों और छोटे-बड़े वाहनों की आवाजाही भी जारी रहती है। लोगों का कहना है कि पुल की जर्जर स्थिति के बावजूद मजबूरी में इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।
मोती नाला को लेकर एक और गंभीर सवाल भी उठ रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नाले के आसपास कुछ स्थानों पर मिट्टी डालकर प्राकृतिक जल निकासी की दिशा को प्रभावित किया गया है। उनका कहना है कि मोती नाला जंगल और आसपास के क्षेत्र का पानी लेकर मुस्का नदी की ओर जाता है। यदि नाले के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण या मिट्टी भराव हुआ है तो भारी बारिश के दौरान इसका असर आसपास की बस्तियों पर पड़ सकता है। हालांकि, इस आरोप की भी प्रशासनिक जांच और मौके के सीमांकन के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
गुस्साए निवासी ने कही पुल को बम से उड़ाने की बात
रमेश यादव ने कहा कि पुल निर्माण की स्वीकृति की बातें लंबे समय से सुनाई जा रही हैं, लेकिन जमीन पर कोई काम दिखाई नहीं देता। उनका कहना है कि चुनाव नजदीक आने पर फिर से पुल निर्माण का मुद्दा गरमाने लगा है और जनता अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि भूमि पूजन और वास्तविक निर्माण कार्य देखना चाहती है। गुस्से में रमेश यादव ने बातचीत के दौरान पुल को बम से उड़ाने जैसी बात भी कही। हालांकि, यह आक्रोश में दिया गया बयान है और किसी भी तरह की हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का समर्थन नहीं किया जा सकता। यह बयान इस बात का संकेत जरूर है कि लंबे समय से लंबित समस्या को लेकर लोगों में नाराजगी किस स्तर तक पहुंच गई है।
अब सवाल खैरागढ़ प्रशासन और संबंधित विभाग से है, क्या मोती नाला पुलिया को लेकर सिर्फ स्वीकृति और टेंडर की फाइलें चलती रहेंगी या वास्तव में निर्माण शुरू होगा? हजारों लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही और सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे पर जनता अब आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर काम शुरू होने का इंतजार कर रही है।
