अब सालभर हो रही खेती, सब्जी उत्पादन से किसान देवकी प्रसाद यादव हर महीने कमा रहे 15 हजार रुपये तक
publicuwatch24.-रायपुर । प्रदेश में मनरेगा के तहत किए जा रहे जल संरक्षण एवं सिंचाई विकास कार्य ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव की नई इबारत लिख रहे हैं। बलरामपुर जिले के ग्राम पंचायत चेरा स्थित खैरदामर पारा में निर्मित सामुदायिक सिंचाई कूप किसानों के लिए नई उम्मीद और समृद्धि का माध्यम बनकर उभरा है। इस योजना ने खेती को वर्षा आधारित व्यवस्था से निकालकर स्थायी सिंचाई व्यवस्था से जोड़ दिया है, जिससे किसानों की आय और उत्पादन क्षमता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
पहले गांव के किसान बारिश पर निर्भर होकर सीमित खेती कर पाते थे। सिंचाई सुविधा के अभाव में रबी फसलों का उत्पादन प्रभावित होता था और गर्मी के मौसम में अधिकांश खेत खाली पड़े रहते थे। लेकिन मनरेगा अंतर्गत निर्मित सामुदायिक सिंचाई कूप ने खेती की तस्वीर बदल दी है। अब किसान खरीफ के साथ-साथ रबी एवं सब्जी फसलों की भी खेती कर रहे हैं। धान, मक्का, सावां और अरहर के अलावा गेहूं, चना, सरसों तथा विभिन्न सब्जियों का उत्पादन बढ़ने से किसानों को बेहतर आमदनी मिल रही है।
गांव के किसानों का कहना है कि सिंचाई सुविधा मिलने से जल संरक्षण के महत्व को समझने का अवसर मिला है। पानी के बेहतर उपयोग से खेती का रकबा बढ़ा है और अब पूरे वर्ष कृषि कार्य संभव हो सका है। इससे ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और खेती लाभकारी व्यवसाय के रूप में उभर रही है।
इसी गांव के प्रगतिशील किसान श्री देवकी प्रसाद यादव ने सामुदायिक सिंचाई कूप का लाभ लेकर बरबटी और भिंडी की खेती शुरू की। उन्होंने मात्र एक माह में लगभग 15 हजार रुपये की आय अर्जित कर आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है। इस अतिरिक्त आमदनी से वे परिवार के भरण-पोषण, बच्चों की जरूरतों एवं उपचार जैसे आवश्यक खर्च आसानी से पूरा कर पा रहे हैं। उनका कहना है कि पहले खेती केवल गुजारे का साधन थी, लेकिन अब यह सम्मानजनक आय का माध्यम बन गई है।
उल्लेखनीय है कि जिला पंचायत सीईओ श्रीमती नयनतारा सिंह तोमर के मार्गदर्शन में जिले में मनरेगा के तहत जल संरक्षण एवं सिंचाई से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता के साथ क्रियान्वित किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 4.43 लाख रुपये की लागत से निर्मित इस सामुदायिक सिंचाई कूप से किसानों को स्थायी सिंचाई सुविधा मिली है। साथ ही निर्माण कार्य के दौरान 748 मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ, जिससे स्थानीय श्रमिकों को भी आजीविका का अवसर प्राप्त हुआ।
मनरेगा के माध्यम से तैयार हो रही ऐसी सामुदायिक परिसंपत्तियां अब ग्रामीण विकास, कृषि उत्पादकता वृद्धि और किसानों की आर्थिक आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव बनती जा रही हैं।
