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    Home » जहां था पुरुषों का दबदबा, वहां अब महिलाओं ने जमाया अपना सिक्का, टीम प्रहरी ने बदली रायपुर के सड़कों की तस्वीर
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    जहां था पुरुषों का दबदबा, वहां अब महिलाओं ने जमाया अपना सिक्का, टीम प्रहरी ने बदली रायपुर के सड़कों की तस्वीर

    Publicuwatch AutherBy Publicuwatch AutherMay 1, 2026No Comments1 Views
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    मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने की थी इनकी सराहना.

    publicuwatch24.-रायपुर: रायपुर में सड़कों से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह साहस, धैर्य और बदलाव की एक ऐसी कहानी बन गई है, जिसे ‘टीम प्रहरी’ की महिलाएं हर दिन जी रही हैं। करीब एक साल पहले शुरू हुई इस पहल में 20 महिलाओं को शामिल किया गया था, जिनकी जिम्मेदारी थी कि कार्रवाई के दौरान महिलाओं से जुड़े मामलों को संभाला जाए, लेकिन धीरे-धीरे इन महिलाओं ने अपनी भूमिका को सीमित दायरे से बाहर निकालकर पूरे ऑपरेशन का अहम चेहरा बना दिया। आज ये महिलाएं न सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में बराबरी से हिस्सा ले रही हैं, बल्कि कई बार सबसे आगे खड़े होकर हालात को नियंत्रित भी करती हैं।
    इन महिलाओं के लिए यह सफर आसान नहीं रहा। शुरुआत में परिवार और समाज दोनों की ओर से कई तरह के सवाल खड़े किए गए। यह कहा गया कि यह काम जोखिम भरा है, लड़कियों के लिए ठीक नहीं है, शादी और बच्चों की जिम्मेदारियों पर असर पड़ेगा। लेकिन इन सब आशंकाओं के बावजूद महिलाओं ने पीछे हटने के बजाय इस चुनौती को स्वीकार किया। आज हालात बदल चुके हैं। जो परिवार पहले चिंतित थे, अब वही गर्व महसूस करते हैं कि उनकी बेटियां शहर की व्यवस्था को बेहतर बनाने में भूमिका निभा रही हैं। टीम की सदस्य श्रीमती संतोषी सोनी कहती हैं कि अब वे काम करते समय महिला या पुरुष के रूप में नहीं सोचतीं, बल्कि एक जिम्मेदार कर्मचारी के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी निभाती हैं।
    मैदान में उतरने के बाद इन महिलाओं को हर दिन नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। AIIMS के पास सांभर-बड़ा के एक ठेले को हटाने की कार्रवाई के दौरान एक महिला ने टीम को अपशब्द कहना शुरू कर दिया। माहौल तनावपूर्ण हो गया, लेकिन टीम की सदस्य श्रीमती बिंदिया ने संयम नहीं खोया और स्थिति को संभाल लिया। इसी तरह पचपेड़ी नाका में कार्रवाई के दौरान विवाद इतना बढ़ गया कि अपशब्द कहने पर FIR दर्ज करानी पड़ी। कई बार ऐसी स्थिति बनती है जब लोग कार्रवाई को व्यक्तिगत तौर पर लेने लगते हैं, क्योंकि टीम के सामने वही महिलाएं खड़ी दिखाई देती हैं, जिनसे उनका सीधा सामना होता है। ऐसे में प्रभावितों का गुस्सा सबसे पहले इन्हीं महिलाओं पर निकलता है।
    हालात कई बार और भी गंभीर हो जाते हैं। समता कॉलोनी में कार्रवाई के दौरान पथराव की घटना हुई, जहां टीम को खुद को बचाते हुए काम जारी रखना पड़ा। वहीं काठाडीह में प्रधानमंत्री आवास योजना की जमीन पर कब्जा हटाने के दौरान सामने से हथियार तक निकाल लिए गए। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि यह काम जोखिम भरा है, मगर प्रशासनिक दायित्व को पूरा कर रही इन महिलाओं ने हमेशा शासकीय अमले के सहारे पर भरोसा किया। टीम की महिलाएं बताती हैं कि अब उन्हें अनुभव के आधार पर यह समझ आने लगा है कि कब सामने वाला पक्ष आक्रामक हो सकता है और कब स्थिति को समझाइश से संभाला जा सकता है। उनके मुताबिक, कई बार सख्ती जरूरी हो जाती है, तो कई बार बातचीत ही सबसे प्रभावी तरीका साबित होती है।
    खमतराई जोन में एक कपड़ा दुकान के बाहर विवाद बढ़ा, तो महिलाओं ने खुद आगे बढ़कर एक युवक को घेरकर समझाया और स्थिति को बिगड़ने से रोका। कई बार ऐसा भी हुआ कि महिलाओं की मौजूदगी के बावजूद पुरुष आक्रामक हो गए और स्थिति और ज्यादा तनावपूर्ण हो गई। ऐसे समय में टीम को मजबूती से खड़ा रहना पड़ता है और जरूरत पड़ने पर सख्ती भी करनी पड़ती है। कुछ मामलों में तो हालात ऐसे बने कि लोगों को जबरन वाहन में बैठाकर हटाना पड़ा। इसके बावजूद टीम ने हर बार यह कोशिश की कि स्थिति नियंत्रण में रहे और किसी तरह का बड़ा विवाद न हो।
    इन महिलाओं को सिटी कोतवाली में विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, जिसने उन्हें न केवल सख्त बनाया है, बल्कि संवेदनशील भी रखा है। यही वजह है कि कार्रवाई के दौरान जब ठेला या गुमटी हटाई जाती है और लोग भावुक होकर रोने लगते हैं, तो यही महिलाएं उन्हें समझाती हैं कि उनका सामान सुरक्षित रहेगा और वे उसे बाद में ले सकते हैं। इस तरह सख्ती और संवेदनशीलता का संतुलन बनाए रखना इनके काम की सबसे बड़ी खासियत बन गया है। टीम की सदस्य बताती हैं कि उनका उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं, बल्कि शहर की व्यवस्था को बेहतर बनाना है।
    कार्रवाई के दौरान कई बार दबाव और लालच भी सामने आते हैं। पैसे देने के प्रस्ताव, पहचान का हवाला और सिफारिशें—यह सब इस काम का हिस्सा हैं, लेकिन टीम ने शुरू से ही यह तय कर लिया है कि किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। यही ईमानदारी उनकी पहचान बनती जा रही है और लोगों के बीच उनके प्रति भरोसा भी बढ़ा रही है। शुरुआत में इस पहल को लेकर लोगों की प्रतिक्रिया मिली-जुली थी। कई लोग इसे सख्ती के रूप में देखते थे और नाराजगी जताते थे, लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलने लगी है। अब सड़कों के चौड़े होने और ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार को लोग महसूस कर रहे हैं।
    नगर निगम पहले भी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करता रहा है, लेकिन महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बाद उसका असर ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। लोग अब यह समझने लगे हैं कि सड़क पर किया गया अतिक्रमण केवल जगह घेरने का मामला नहीं है, बल्कि इससे दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ता है। टीम की सदस्य पिंकी बताती हैं कि शुरुआत में परिचित लोग भी ताने देते थे और उनके काम को लेकर सवाल उठाते थे। लेकिन अब वही लोग समझ रहे हैं कि यह काम क्यों जरूरी है। समाज में इस बदलाव को महिलाएं अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हैं। उनके लिए यह केवल नौकरी नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदारी है, जिसके जरिए वे शहर को बेहतर बना रही हैं।
    आज हालात यह हैं कि ‘टीम प्रहरी’ की इस पहल को हर स्तर पर सराहना मिल रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय से लेकर महापौर श्रीमती मीनल चौबे तक इस टीम के काम की तारीफ कर चुके हैं। लेकिन इन महिलाओं को असली संतोष तब मिलता है, जब वे सड़कों को साफ और व्यवस्थित देखती हैं और लोगों को सुरक्षित चलते हुए पाती हैं। टीम प्रहरी में इन महिलाओं की है अहम भूमिका -श्रीमती कविता नायक, कु. कहकशां परवीन, श्रीमती कांता निहाल, श्रीमती सुकांति सिक्का, श्रीमती बिंदिया नाग, श्रीमती विमला ताण्डी, श्रीमती मंजु आमदे, श्रीमती पिंकी निहाल, श्रीमती रोमा मेरी अरोरा, श्रीमती कल्पना बघेल, श्रीमती गौरी साहू, श्रीमती गौतमा मेश्राम, श्रीमती डॉली भिवंडे, श्रीमती पूर्णिमा बघेल, श्रीमती छुनकी हरपाल, कु. तुलिका कौशल, कु. ममता भिवंडे, श्रीमती लता ताण्डी, श्रीमती समीमा बेगम तथा श्रीमती संतोषी सोनी। ‘टीम प्रहरी’ की महिला टीम आज सिर्फ कार्रवाई का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि बदलाव की अग्रिम पंक्ति में खड़ी वो महिलाएं हैं, जो हर दिन यह साबित कर रही हैं कि हिम्मत और जिम्मेदारी के सामने कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती।

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