
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने जजों को माय लॉर्ड या योर लॉर्डशिप के संबोधन की बजाय सम्मानजनक शब्द सर कहने की अपील की है। सचिव अब्दुल वहाब खान ने मंगलवार को बयान जारी कर कहा है कि माय लॉर्ड या योर लॉर्डशिप संबोधन राजशाही का प्रतीक होने के साथ ही गुलामी की निशानी है, लिहाजा अधिवक्ताओं को इससे परहेज करना चाहिए। अधिवक्ता भी न्यायालय का अहम अधिकारी होता है और जहां तक न्याय प्राप्त करने का सवाल है तो ये लोगों का संवैधानिक अधिकार है। आजाद भारत में न्याय देने या दिलाने के लिए ऐसे किसी गुलामी युक्त संबोधन की जरूरत नहीं है।
दरअसल राजस्थान हाईकोर्ट के सोमवार को दिए एक बयान के बाद मामले ने तूल पकड़ा है। हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं से कहा कि वो कोर्ट में जजों को माय लॉर्ड या योर लॉर्डशिप कहकर न बुलाएं। ये शब्द गुलामी की दासता का प्रतीक है, बेहतर हो कि इसकी बजाय सम्मानजनक शब्द सर का इस्तेमाल किया जाए। राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले का साथी जजों ने समर्थन किया और इसे संविधान में उल्लेखित समानता के अधिकार के तहत लिया। अब राजस्थान हाईकोर्ट में जजों के लिए योर ऑनर या योर लॉर्डशिप जैसे संबोधनों का इस्तेमाल नहीं हो सकेगा।
सुको के जस्टिस ने 2014 में किया था इंकार : सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एचएल दत्तु व जस्टिस एसए बोवड़े की बेंच ने 2014 में योर ऑनर या योर लॉर्डशिप जैसे संबोधनों से इंकार करते हुए कहा था कि हमने इन शब्दों के इस्तेमाल की आजादी कभी नहीं दी है। ना ही किसी से कहा है कि इन शब्दों का प्रयोग करें। आप हमें सिर्फ सम्माानजनक तरीके से बुलाएं। वैसे भी ये शब्द गुलामी का प्रतीक है और इनका प्रयोग बंद होना चाहिए।
बार काउंसिल आफ इंडिया ने 2006 में जारी किया था सर्कुलर : बार काउंसिल आफ इंडिया ने 2006 में सर्कुलर जारी कर योर ऑनर या योर लॉर्डशिप जैसे शब्दों के इस्तेमाल को खारिज करते हुए सर जैसे सम्मानजनक संबोधन का उपयोग करने की सलाह अधिवक्ताओं को दी थी। इस परिप्रेक्ष्य में छग हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने पूर्व में भी ऐसे संबोधनों का इस्तेमाल नहीं करने का प्रस्ताव पारित किया था। सचिव अब्दुल वहाब खान ने न्यायलय कक्ष में प्रवेश व बाहर निकलते समय 90 डिग्री झुकने से भी परहेज करने को कहा है। उन्होंने कहा सम्मान प्रदर्शित करने का ये तरीका भी सही नहीं है और ऐसा करना आवश्यक भी नहीं है।